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मौन की यात्रा - जीवन सत्य और स्वतंत्रत

मौन की यात्रा - जीवन सत्य और स्वतंत्रत

ौन के पवित्र आश्रय में सौंदर्य जीवंत हो उठता है। मौन के उस निर्मल सौंदर्य की वेदी पर विनम्रता जीवन के साथ सहजता से खेलती है। और जब विनम्रता में एक आंतरिक लय उत्पन्न होती है, तब उसके प्रकाश में निर्दोषिता स्वयं को प्रकट करने लगती है।

पातंजल योग दर्शन में असंप्रज्ञात समाधि

पातंजल योग दर्शन में असंप्रज्ञात समाधि

महर्षि पतंजलि ने समाधि को मुख्य रूप से दो उच्च अवस्थाओं में विभाजित किया है: संप्रज्ञात समाधि और असंप्रज्ञात समाधि। इनमें 'असंप्रज्ञात समाधि' योग की सर्वोच्च और अंतिम अवस्था है, जो सीधे कैवल्य (मोक्ष) की ओर ले जाती है।

पातंजल योग दर्शन में संप्रज्ञात समाधि

पातंजल योग दर्शन में संप्रज्ञात समाधि

जब साधक ध्यान में गहरा उतरता है और उसका चित्त पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब वह 'समाधि' की अवस्था में प्रवेश करता है। महर्षि पतंजलि ने समाधि को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया है: संप्रज्ञात समाधि (Samprajnata Samadhi) और असंप्रज्ञात समाधि (Asamprajnata Samadhi)।

अष्टांगयोग के पाँचवें अंग - प्रत्याहार

अष्टांगयोग के पाँचवें अंग - प्रत्याहार

पतंजलि योगसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता के आलोक में प्रत्याहार (इन्द्रिय-प्रत्याहार) की गूढ़ व्याख्या, बहिर्मुखी मन को अन्तर्मुखी बनाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया, प्राणायाम की सहायक भूमिका एवं पञ्चेन्द्रियों के विषय-निरोध का व्यावहारिक विवेचन।

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