मन की तादात्म्य अवस्था, साक्षी भाव एवं चित्त-निरोध

मानव चेतना का सबसे जटिल और सूक्ष्म रहस्य मन की वह अवस्था है, जहाँ दृष्टा (सीअर) और दृश्य (सीन) का भेद पूरी तरह मिट जाता है। व्यवहार में इसे मन का विचारों के साथ तादात्म्य (Identification) या एकात्म भाव कहा जाता है। जब तक चेतना स्वयं को मन के स्पंदनों से अलग नहीं देख पाती, तब तक वह मन के विकारों, सुख-दुःख और उथल-पुथल को अपना ही स्वरूप मान लेती है।
तादात्म्य का स्वरूप और त्रिगुणमयी तरंगें
मन जब किसी विचार को जन्म देता है, तो वह केवल एक तटस्थ सूचना नहीं होती; उसके साथ एक गहरा भावनात्मक आवेश (Emotional Charge) जुड़ा होता है। जब विचार उठता है और चेतना उसके साथ पूरी तरह एकात्म हो जाती है, तो साधक या व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह उस विचार का दृष्टा है। वह स्वयं वही विचार बन जाता है। यह एकात्म भाव मुख्य रूप से तीन आलंबनों के आश्रय से चित्त पर अपना अधिकार जमाता है:
- अतीत की स्मृतियाँ (Memory Trace): संचित संस्कारों से उकेरी गई वे घटनाएँ जो काल बीत जाने पर भी चित्त की भूमि (चित्त-आकाश) में अमिट रेखा की तरह अंकित रहती हैं।
- संबध और तादात्म्य (Relational Identification): व्यक्तियों और परिस्थितियों से जुड़े वे काल्पनिक या वास्तविक ढाँचे, जिन्हें मन ने अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया है।
- राग-द्वेष की दोहरी तरंगे (Dual Waves of Attachment and Aversion): अनुकूल विषय के प्रति आसक्ति (राग) और प्रतिकूल विषय के प्रति घृणा या भय (द्वेष)। महर्षि पतंजलि ने ‘योगसूत्र’ के साधन पाद में राग और द्वेष को अविद्या के बाद सबसे बड़ा ‘क्लेश’ माना है। वे कहते हैं:
सुखानुशयी रागः॥ २.७ ॥ दुःखानुशयी द्वेषः॥ २.८ ॥
(अर्थात: सुख के अनुभव के पीछे रहने वाली तन्मयता ‘राग’ है, और दुःख के अनुभव के पीछे रहने वाली प्रतिकार की भावना ‘द्वेष’ है।)
जब मन में अतीत की किसी अप्रिय घटना या संबंध का विचार आता है, तो द्वेष की तरंग उठती है; जब किसी प्रिय वस्तु का स्मरण होता है, तो राग की तरंग उठती है। यह राग-द्वेष ही मन को चेतना के साथ गोंद की तरह चिपका देता है, जिससे तादात्म्य का जन्म होता है।
अवस्था-त्रय (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का संधि-काल और चेतना की विक्षिप्तता
मानव मन प्रतिदिन तीन प्रमुख अवस्थाओं से गुजरता है—जाग्रत (Waking State), स्वप्न (Dream State), और सुषुप्ति (Deep Sleep)। मांडूक्य उपनिषद इन तीनों अवस्थाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए चेतना के मूल स्वरूप ‘तूरीय’ को रेखांकित करता है। जब कोई व्यक्ति सुषुप्ति (गहरी अचेतन निद्रा) से स्वप्न में प्रवेश करता है, या स्वप्नावस्था से तुरंत जाग्रत अवस्था में आता है, तो बीच का वह क्षण ‘संधि-काल’ कहलाता है। निद्रा से बाहर निकलते ही मन एकाएक चेतन जगत के संपर्क में नहीं आता; वह एक प्रकार के धुंधले, भावात्मक और भ्रमित वातावरण में रहता है। इस संधि-क्षण में चित्त की वृत्ति अत्यंत अस्थिर और विचलित होती है। स्वप्न का झूठा संसार और जाग्रत का वास्तविक संसार दोनों आपस में उलझ जाते हैं। मन को अपनी तार्किक, व्यावहारिक और शांत अवस्था (Baseline Consciousness) में लौटने में कुछ समय लगता है। यह इस बात का प्रमाण है कि मन बिना किसी आलंबन के स्वतः स्थिर नहीं रह सकता; वह संस्कारों की लहरों पर हिचकोले खाता रहता है।
ध्यान-साधना में विक्षेप और ‘विचार-श्रृंखला’ (Thought Chain)
ध्यान की प्रक्रिया में जब साधक लंबे समय तक एक ही आसन में बैठता है, तो स्थूल शरीर तो स्थिर हो जाता है, किंतु सूक्ष्म मन की परतें खुलने लगती हैं। उस समय बाह्य कोलाहल शांत होने के कारण अंतःकरण की दबी हुई वृत्तियाँ (अव्यक्त विचार) सतह पर आने लगती हैं। साधना के उस शांत क्षण में अचानक कोई एक साधारण विचार कौंधता है। यदि साधक अप्रमत्त (Alert) न रहे, तो मन तुरंत उस विचार के साथ जुड़कर एक भावनात्मक तरंग पैदा कर देता है। फिर उस एक विचार से जुड़ा हुआ दूसरा विचार, दूसरे से तीसरा—इस प्रकार विचारों की एक अंतहीन श्रृंखला (Thought-Chain) निर्मित हो जाती है। इसे पतंजलि योगशास्त्र में ‘विक्षेप’ या ‘चित्त की चंचलता’ कहा गया है। जब विचारों का यह वेग बहने लगता है, तो साधना का मूल लक्ष्य ‘समत्व’ (Equanimity) टूट जाता है। ऐसी अवस्था में श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में वर्णित ‘स्थितप्रज्ञ’ की स्थिति में बने रहना अत्यंत कठिन हो जाता है। जब मन विचारों की बाढ़ में बह रहा हो, तो अपने वास्तविक स्वरूप—‘स्व’ (आत्मा)—से जुड़े रहना और भी दुष्कर हो जाता है।
समाधान के दो स्तंभ: प्रतिपक्ष भावना और अद्वैत वेदांत का विवेक
इस तादात्म्य और वैचारिक विक्षेप से बाहर निकलने के लिए भारतीय दर्शन दो अत्यंत व्यावहारिक और प्रभावी पद्धतियाँ प्रदान करता है:
- योग शास्त्र की पद्धति: प्रतिपक्ष भावनम् जब मन में कोई नकारात्मक, राग-द्वेष युक्त या विचलित करने वाला विचार आए, तो योगसूत्र उसके विपरीत (सकारात्मक व विवेकपूर्ण) विचार लाने का निर्देश देता है:
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥ २.३३ ॥ (अर्थात: जब मन में असत्य, हिंसा, राग या विक्षेप रूपी वितर्क बाधा डालें, तो उनके निवारण के लिए विपरीत (प्रतिपक्ष) कल्याणकारी विचारों का चिंतन करना चाहिए।)
यदि मन में किसी के प्रति द्वेष आ रहा हो, तो तुरंत उसके प्रति करुणा, क्षमा या वेदांतिक अनित्यता का विचार लाना ही ‘प्रतिपक्ष भावना’ है। यह मन की नकारात्मक तरंग को बेअसर करने की प्राथमिक दवा है।
- अद्वैत वेदांत की पद्धति: साक्षी भाव और दृग्-दृश्य विवेक वेदांत प्रतिपक्ष भावना से भी एक कदम आगे बढ़कर सीधा चेतना के केंद्र पर प्रहार करता है। अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत ‘दृग्-दृश्य विवेक’ पर आधारित है: “जो देखा जा रहा है (दृश्य), वह देखने वाले (दृष्टा) से अलग है।”
विचार मन में आता है, ठहरता है, और चला जाता है। लेकिन ‘मैं’—वह चेतना जो विचार को आती और जाती हुई देख रही है—अचल, अपरिवर्तनीय और नित्य है। अद्वैत वेदांत का सिद्ध मंत्र है:
- विचार के आने से पहले भी ‘मैं’ (साक्षी) मौजूद था।
- विचार के रहते हुए भी ‘मैं’ उस विचार से पृथक उसका द्रष्टा हूँ।
- विचार के चले जाने के बाद भी ‘मैं’ ज्यों का त्यों शेष रहता हूँ। स्वामी विवेकानंद और भगवद्पाद आदि शंकराचार्य ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि आत्मा मन का अंग नहीं है, बल्कि मन आत्मा के प्रकाश में प्रकाशित होने वाला एक जड़ उपकरण मात्र है। ‘तत्त्वबोध’ में आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि पंचकोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) से परे जो आत्मा है, वही सत्य है। मनोमय कोश (मन) केवल विचारों की समष्टि है, वह ‘आप’ नहीं हैं।
मन, काल (Time) और ‘वर्तमान क्षण’ का त्रिकोण
मन के अस्तित्व की सबसे बड़ी शर्त है—काल (Time)। मन कभी भी ‘वर्तमान क्षण’ में जीवित नहीं रह सकता। मन या तो अतीत की स्मृतियों (Past) में भोजन तलाशता है या भविष्य की कल्पनाओं (Future) में अपनी सुरक्षा और वासनाओं को टटोलता है। राग और द्वेष दोनों काल के आश्रित हैं—राग अतीत के सुख की पुनरावृत्ति चाहता है, और द्वेष अतीत के दुख से भविष्य में बचना चाहता है। ध्यान की पराकाष्ठा तब घटित होती है जब साधक काल के चक्र को तोड़कर ‘अधुना’ (Present Moment) में प्रवेश करता है। जैसे ही साक्षी-भाव के द्वारा मन को ‘वर्तमान क्षण’ में खींच लाया जाता है, काल की डोर टूट जाती है। काल के टूटते ही मन का ताना-बाना बिखर जाता है। वर्तमान में कोई विचार नहीं होता; वर्तमान में केवल ‘होना’ (Being) होता है, ‘सोचना’ (Thinking) नहीं।
श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण मन को वश में करने का उपाय बताते हुए कहते हैं:
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥ ६.२५ ॥
(अर्थात: धैर्युक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे संसार से उपराम (विराम) को प्राप्त होवे, और मन को परमात्मा (स्व-स्वरूप) में स्थिर करके फिर किसी भी वस्तु का चिंतन न करे।)
निष्कर्ष: स्व-स्वरूप में स्थिति ध्यान की यात्रा मन के साथ लड़ने की यात्रा नहीं है, बल्कि मन से अपनी पहचान (तादात्म्य) हटाने की यात्रा है। जब साधक यह गहराई से अनुभव कर लेता है कि—“मैं मन नहीं हूँ, मैं विचार नहीं हूँ, मैं राग-द्वेष से परे नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा हूँ”—तब स्वप्न, जाग्रत, या ध्यान के विक्षेप उसे विचलित नहीं कर पाते। इस बोध के घटित होते ही मन की तरंगे शांत हो जाती हैं, और साधक अपनी सहज अद्वैत स्थिति, यानी स्वरूप-स्थिति (Self-Realization) में विश्राम पाता है। यही योग का अंतिम लक्ष्य ‘चित्त-वृत्ति निरोध:’ और वेदांत का ‘कैवल्य’ है।


