पातंजल योग दर्शन में असंप्रज्ञात समाधि


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महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत ‘योगसूत्र’ भारतीय दर्शन परंपरा का एक अनमोल रत्न है, जो मानव मन की जटिलताओं को समझने और उसे परम शांति तक ले जाने का वैज्ञानिक मार्ग प्रस्तुत करता है। पतंजलि ने अपने ग्रंथ के आरंभ में ही योग का मूल उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है— “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”। अर्थात्, चित्त (मन, बुद्धि और अहंकार) की वृत्तियों (अशांत विचारों और भावनाओं) का पूर्ण रूप से रुक जाना ही योग है। जब चित्त की ये लहरें शांत हो जाती हैं, तब साधक समाधि की अवस्था में प्रवेश करता है। महर्षि पतंजलि ने समाधि को मुख्य रूप से दो उच्च अवस्थाओं में विभाजित किया है: संप्रज्ञात समाधि और असंप्रज्ञात समाधि। इनमें ‘असंप्रज्ञात समाधि’ योग की सर्वोच्च और अंतिम अवस्था है, जो सीधे कैवल्य (मोक्ष) की ओर ले जाती है।

नीचे असंप्रज्ञात समाधि के स्वरूप, इसके साधन, प्रकार और अंतिम परिणामों का विस्तृत और गूढ़ विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

असंप्रज्ञात समाधि का स्वरूप क्या है? जब साधक संप्रज्ञात समाधि का अभ्यास करता है, तो उसका चित्त किसी न किसी ‘आलम्बन’ (ध्यान के विषय, जैसे कोई मंत्र, श्वास, या मूर्ति) पर एकाग्र होता है। लेकिन असंप्रज्ञात समाधि वह अवस्था है जहाँ चित्त को किसी भी सहारे या आलम्बन की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह पूर्ण रूप से ‘निरालंब’ अवस्था है।

महर्षि पतंजलि योगसूत्र के प्रथम पाद के 18वें सूत्र में इसकी परिभाषा देते हुए कहते हैं: “विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः” अर्थात्, वह समाधि जिसमें चित्त की सभी वृत्तियों को रोक देने वाले कारण (परम वैराग्य) का बार-बार अभ्यास किया जाता है और जहाँ चित्त में वृत्तियों का पूर्ण अभाव हो जाता है तथा केवल ‘संस्कार’ मात्र शेष रह जाते हैं, उसे असंप्रज्ञात (अन्य) समाधि कहते हैं।

इस अवस्था में साधक को किसी भी बाह्य या आंतरिक विषय का ज्ञान (प्रज्ञा) नहीं रहता। संप्रज्ञात समाधि के सर्वोच्च स्तर पर साधक को ‘ऋतंभरा प्रज्ञा’ (सत्य को धारण करने वाली शुद्ध बुद्धि) प्राप्त होती है, परंतु असंप्रज्ञात समाधि में प्रवेश करने के लिए साधक को उस शुद्ध ज्ञान या प्रज्ञा का भी त्याग करना पड़ता है। जब चित्त में कोई विचार, कल्पना, या ध्येय वस्तु नहीं बचती, तो मन एक शांत और निर्वात समुद्र की तरह हो जाता है।

परम वैराग्य: असंप्रज्ञात समाधि का साधन असंप्रज्ञात समाधि तक पहुँचना किसी साधारण अभ्यास से संभव नहीं है। इसके लिए ‘परम वैराग्य’ की आवश्यकता होती है। जब साधक प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) से उत्पन्न होने वाले सभी सुखों, सिद्धियों और यहां तक कि समाधि से प्राप्त होने वाले अलौकिक आनंद से भी पूरी तरह विरक्त हो जाता है, तब परम वैराग्य का उदय होता है। परम वैराग्य के प्रभाव से चित्त की वृत्तियां उत्पन्न होना पूरी तरह बंद हो जाती हैं और साधक असंप्रज्ञात अवस्था में गोता लगाता है।

असंप्रज्ञात समाधि के दो प्रकार (अधिकारी भेद से) महर्षि पतंजलि ने इस सर्वोच्च समाधि को प्राप्त करने वाले साधकों और उनकी स्थितियों के आधार पर इसे दो भागों में विभक्त किया है:

1. भवप्रत्यय असंप्रज्ञात समाधि: यह समाधि ‘विदेह’ (जिनका स्थूल शरीर नहीं है, जैसे देवता) और ‘प्रकृतिलय’ (जो प्रकृति के सूक्ष्म तत्वों में लीन हो गए हैं) योगियों को प्राप्त होती है। ऐसे योगी अपने अभ्यास के बल पर वृत्तियों को शांत तो कर लेते हैं, परंतु उनका अज्ञान (अविद्या) पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता। वे एक ऐसी शून्य अवस्था में चले जाते हैं जो असंप्रज्ञात समाधि जैसी ही प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में वह मोक्ष नहीं है। जब उनके पुण्यों और संस्कारों की अवधि समाप्त हो जाती है, तो उन्हें पुनः संसार में जन्म लेना पड़ता है। इसलिए इसे ‘भवप्रत्यय’ (संसार के कारण वाली) कहा जाता है।

2. उपायप्रत्यय असंप्रज्ञात समाधि: यह वास्तविक योगियों की समाधि है, जो मुक्ति का कारण बनती है। ‘उपाय’ का अर्थ है वे साधन जिन्हें अपनाकर एक सच्चा साधक इस अवस्था तक पहुँचता है। पतंजलि ने इसके पांच प्रमुख अंग बताए हैं:

  • श्रद्धा: योग मार्ग और सत्य के प्रति एक कल्याणकारी और अटल विश्वास, जो साधक को एक स्नेही माता के समान ऊर्जा देता है।
  • वीर्य: साधना के पथ पर निरंतर आगे बढ़ने का उत्साह, बल और मानसिक शक्ति।
  • स्मृति: ध्यान के विषय को निरंतर स्मरण रखना और मन को भटकने से रोकना।
  • समाधि: चित्त की पूर्ण एकाग्रता।
  • प्रज्ञा: सत्य और असत्य का भेद करने वाला विवेक ज्ञान।

इन पांच उपायों के माध्यम से जब साधक आगे बढ़ता है, तो वह पहले संप्रज्ञात समाधि सिद्ध करता है और फिर उसके भी परे जाकर ‘उपायप्रत्यय’ असंप्रज्ञात समाधि प्राप्त करता है, जो उसे जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त कर देती है।

संस्कारों का निरोध और निर्बीज समाधि असंप्रज्ञात समाधि की शुरुआत में, चित्त की वृत्तियां तो रुक जाती हैं, लेकिन पूर्व जन्मों और इस जन्म के गहरे ‘संस्कार’ चित्त में दबे रहते हैं। पतंजलि कहते हैं कि असंप्रज्ञात समाधि के अभ्यास से जो नए और शुद्ध संस्कार उत्पन्न होते हैं, वे अत्यंत बलवान होते हैं। ये नए संस्कार मन में दबे हुए पुराने सांसारिक संस्कारों (जो क्लेश और पुनर्जन्म का कारण हैं) को नष्ट कर देते हैं।

किंतु अंतिम मुक्ति के लिए इन शुद्ध संस्कारों का भी नष्ट होना आवश्यक है। जब असंप्रज्ञात समाधि अत्यधिक परिपक्व हो जाती है, तो अंततः समाधि से उत्पन्न होने वाले संस्कार भी स्वयं को समाप्त कर लेते हैं। पतंजलि इसे सूत्र 1.51 में स्पष्ट करते हैं: “तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः” अर्थात्, जब उस अंतिम संस्कार का भी निरोध हो जाता है, तो चित्त पूर्ण रूप से वृत्ति और संस्कार रहित हो जाता है। इस अवस्था को ‘निर्बीज समाधि’ कहा जाता है। ‘बीज’ का अर्थ है क्लेश, कर्म और पुनर्जन्म का कारण। जब चित्त में कोई बीज ही नहीं बचता, तो अज्ञान और दुखों का दोबारा अंकुरित होना असंभव हो जाता है। असंप्रज्ञात समाधि की चरम परिणति ही निर्बीज समाधि है।

कैवल्य: योग का अंतिम लक्ष्य असंप्रज्ञात समाधि के सिद्ध होने पर क्या होता है? इसका उत्तर पतंजलि पहले पाद के तीसरे सूत्र में ही दे देते हैं: “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” जब चित्त की सभी वृत्तियां और संस्कार असंप्रज्ञात (निर्बीज) समाधि के द्वारा पूर्णतः शांत हो जाते हैं, तब ‘द्रष्टा’ (जीवात्मा या पुरुष) अपने वास्तविक, शुद्ध, चेतन और विकाररहित स्वरूप में स्थित हो जाता है।

सामान्य अवस्था में हमारी चेतना हमारे शरीर, मन, विचारों और भावनाओं के साथ उलझी रहती है। हम अपने दुखों, सुखों और मानसिक वृत्तियों को ही अपना स्वरूप मान बैठते हैं। परंतु असंप्रज्ञात समाधि में प्रकृति (चित्त) और पुरुष (आत्मा) का पूर्ण अलगाव हो जाता है। आत्मा प्रकृति के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपनी अनंत महिमा, शुद्ध चेतना और स्वयंप्रकाश रूप में स्थापित हो जाती है। इसी सर्वोच्च और परम स्वतंत्र अवस्था को योग दर्शन में ‘कैवल्य’ कहा गया है।

निष्कर्ष: सार रूप में, असंप्रज्ञात समाधि केवल मन को शून्य करने की कला नहीं है, बल्कि यह चेतना के उच्चतम शिखर की यात्रा है। संप्रज्ञात समाधि जहाँ साधक को प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान और अलौकिक सिद्धियां प्रदान करती है, वहीं असंप्रज्ञात समाधि उन सभी सिद्धियों और ज्ञान को पीछे छोड़कर ‘स्वयं’ को जानने का मार्ग है। यह उस परम वैराग्य का फल है जहाँ साधक यह जान लेता है कि आत्मा के अतिरिक्त यह पूरा दृश्य जगत नश्वर है। असंप्रज्ञात समाधि का यह अभ्यास ही मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर कैवल्य रूपी परम प्रकाश और शाश्वत शांति में स्थापित करता है।