पातंजल योग दर्शन में संप्रज्ञात समाधि


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महर्षि पतंजलि द्वारा रचित ‘योगसूत्र’ ध्यान, मन के नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार का सबसे प्राचीन व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। महर्षि पतंजलि योग की व्याख्या करते हुए अपने दूसरे ही सूत्र में कहते हैं - “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”, अर्थात् चित्त (मन) की वृत्तियों (अशांत विचारों, भावनाओं और धारणाओं) को रोकना ही योग है। हमारा मन हमेशा एक समुद्र की तरह होता है जिसमें विचारों की लहरें उठती और गिरती रहती हैं। योग का मुख्य उद्देश्य इन लहरों (वृत्तियों) को रोककर मन को पूरी तरह से शांत और एकाग्र करना है।

जब साधक ध्यान में गहरा उतरता है और उसका चित्त पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब वह ‘समाधि’ की अवस्था में प्रवेश करता है। महर्षि पतंजलि ने समाधि को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया है: संप्रज्ञात समाधि (Samprajnata Samadhi) और असंप्रज्ञात समाधि (Asamprajnata Samadhi)। यह लेख विशेष रूप से ‘संप्रज्ञात समाधि’ और इसके विभिन्न प्रकारों पर गहराई से प्रकाश डालता है।

संप्रज्ञात समाधि क्या है?

संप्रज्ञात समाधि वह अवस्था है जिसमें योगी का चित्त किसी एक विशेष ‘आलम्बन’ (ध्यान के विषय या सहारे) पर पूरी तरह से एकाग्र रहता है। यह आलम्बन (ध्येय) कोई भौतिक वस्तु, मूर्ति, श्वास, किसी मंत्र की ध्वनि या कोई सूक्ष्म तत्व हो सकता है जिस पर साधक अपना ध्यान केंद्रित करता है।

जब अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्त की सांसारिक वृत्तियां क्षीण (शांत) हो जाती हैं, तो चित्त एक निर्मल स्फटिक मणि (Crystal) के समान हो जाता है। जैसे एक पारदर्शी स्फटिक मणि जिस रंग की वस्तु के पास रखी जाती है, वह उसी रंग की दिखने लगती है, ठीक वैसे ही योगी का निर्मल चित्त जिस आलम्बन (ध्येय) पर टिकता है, वह पूरी तरह से उसी का रूप धारण कर लेता है।

पतंजलि योगसूत्र के प्रथम पाद (समाधि पाद) के 17वें सूत्र में संप्रज्ञात समाधि के चार मुख्य भेद बताए गए हैं:

“वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्संप्रज्ञातः”

अर्थात्, वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के भेद से संप्रज्ञात योग चार प्रकार का होता है।

संप्रज्ञात समाधि के चार मुख्य चरण

1. सवितर्क और निर्वितर्क समाधि (Savitarka and Nirvitarka Samadhi)

यह संप्रज्ञात समाधि का पहला और सबसे प्रारंभिक स्तर है, जिसमें ध्येय वस्तु स्थूल (Physical/Gross) होती है। स्थूल वस्तु जैसे देवता की मूर्ति, श्वास की गति, या कोई मंत्र।

  • सवितर्क समाधि: इस अवस्था में ध्येय वस्तु का शब्द (नाम), अर्थ (उसका स्वरूप), और ज्ञान (उसके बारे में हमारी जानकारी) चित्त में एक साथ मिले-जुले रहते हैं। जैसे यदि आप किसी मंत्र का ध्यान कर रहे हैं, तो मंत्र की ध्वनि, उसका अर्थ और उससे जुड़ी आपकी यादें मन में तरंगे (वृत्तियां) उत्पन्न करती हैं।

  • निर्वितर्क समाधि: जब ध्यान बहुत गहरा हो जाता है और स्मृति पूरी तरह शुद्ध हो जाती है, तो चित्त से शब्द और पूर्व-ज्ञान के विकल्प हट जाते हैं। इस अवस्था में ध्येय वस्तु बिना किसी नाम या अर्थ की मिलावट के अपने यथार्थ स्वरूप में चमकती है, और चित्त उस वस्तु के साथ इस तरह एकाकार हो जाता है मानो चित्त का अपना कोई अस्तित्व ही न हो। यह ठीक वैसा है जैसे किसी अनजान व्यक्ति की तस्वीर देखने पर केवल उसका चित्र दिखाई देता है, उससे जुड़ी कोई व्यक्तिगत यादें या नाम नहीं जुड़ते।

2. सविचार और निर्विचार समाधि (Savicara and Nirvicara Samadhi)

जब ध्यान स्थूल वस्तुओं से हटकर सूक्ष्म विषयों (Sukshma Vishaya) पर केंद्रित होता है, तो उसे सविचार समाधि कहते हैं। सूक्ष्म विषय का अर्थ है पंचतन्मात्राएं (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द) या वह मूल ऊर्जा जिससे स्थूल जगत का निर्माण होता है।

  • सविचार समाधि: इसमें साधक सूक्ष्म विषयों का ध्यान देश (स्थान), काल (समय) और धर्म की सीमाओं के साथ करता है। चित्त अभी भी इन विकल्पों से बंधा होता है।

  • निर्विचार समाधि: यह सविचार से भी गहरी अवस्था है। इसमें सूक्ष्म विषय से जुड़े देश-काल के सभी विकल्प नष्ट हो जाते हैं और साधक केवल उस सूक्ष्म तत्त्व के शुद्ध स्वरूप में लीन हो जाता है। निर्विचार समाधि के सिद्ध और निर्मल होने पर योगी को ‘अध्यात्मप्रसाद’ की प्राप्ति होती है, जो अत्यंत निर्मलता और शुद्ध अंतःकरण की स्थिति है। इसी अवस्था में योगी के चित्त में ‘ऋतंभरा प्रज्ञा’ जागृत होती है। ‘ऋतंभरा’ का अर्थ है जो केवल सत्य (ऋत) को ही धारण करती है; इस बुद्धि में अविद्या, विपर्यय या मिथ्या ज्ञान का लेशमात्र भी नहीं रहता।

3. सानन्द समाधि (Sananda Samadhi)

यह समाधि का वह स्तर है जहाँ ध्यान बाहरी सूक्ष्म विषयों से भी आगे बढ़कर ध्यान करने वाले चित्त और इंद्रियों (सात्विक अहंकार) पर केंद्रित हो जाता है। जब चित्त सूक्ष्म आलम्बन में पूरी तरह डूब कर एकाग्रता की पराकाष्ठा पर पहुंचता है, तो एक स्वाभाविक आनंद और आह्लाद की अनुभूति होती है। यही शुद्ध आनंद सानन्द समाधि का लक्षण है। इस अवस्था में साधक को सांसारिक सुख-दुख का कोई भान नहीं रहता, बल्कि वह एक अलौकिक सात्विक सुख का अनुभव करता है।

4. सास्मित समाधि (Sasmita Samadhi)

‘अस्मिता’ का अर्थ है “मैं हूँ” का शुद्ध भाव (Pure I-ness)। सास्मित समाधि संप्रज्ञात समाधि का सर्वोच्च और सबसे सूक्ष्म स्तर है।

सामान्य जीवन में हमारा ‘मैं’ हमारे शरीर, उम्र, लिंग, सामाजिक पदों (जैसे पिता, माता, डॉक्टर) और व्यक्तित्व से जुड़ा होता है। परंतु, सास्मित समाधि में यह ‘अस्मिता’ इन सभी शारीरिक और सामाजिक उपाधियों से पूरी तरह मुक्त हो जाती है। साधक को केवल अपने एक शुद्ध चेतन सत्ता (Conscious being) होने का अनुभव होता है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। इस अवस्था में जीवात्मा अपने यथार्थ स्वरूप का साक्षात्कार कर लेती है। सास्मित समाधि ही वह अंतिम द्वार है जो असंप्रज्ञात समाधि की ओर ले जाता है।

सबीज समाधि (Sabija Samadhi)

महर्षि पतंजलि स्पष्ट करते हैं कि उपर्युक्त चारों प्रकार की समाधियां (सवितर्क, सविचार, सानन्द, सास्मित) ‘सबीज समाधि’ (Sabija Samadhi) कहलाती हैं। ‘सबीज’ का अर्थ है ‘बीज के साथ’। चूंकि इन सभी समाधियों में कोई न कोई बाहरी या भीतरी आलम्बन (सहारा या वस्तु) मौजूद होता है, इसलिए इनमें क्लेशों (अविद्या, राग, द्वेष आदि) और कर्मों का बीज पूरी तरह से नष्ट नहीं होता। सांसारिक विषयों के बीज चित्त में दबे रहते हैं, जो भविष्य में फिर से वृत्तियों और जन्म-मरण का कारण बन सकते हैं।

निष्कर्ष

संप्रज्ञात समाधि योग मार्ग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक पड़ाव है। अविद्या, जो सभी दुखों का मूल कारण है, का नाश करने के लिए सत्य का यथार्थ ज्ञान (ऋतंभरा प्रज्ञा) होना आवश्यक है, जो निर्विचार समाधि से प्राप्त होता है। जब साधक निरंतर अभ्यास से संप्रज्ञात समाधि के सर्वोच्च शिखर (सास्मित समाधि) पर पहुँच जाता है, तब वह ‘परम वैराग्य’ के द्वारा उस समाधि से उत्पन्न होने वाले संस्कारों को भी रोक देता है।

जब यह अंतिम संस्कार भी रुक जाता है, तब चित्त की सभी वृत्तियां पूर्णतः निरुद्ध हो जाती हैं और साधक असंप्रज्ञात समाधि (बिना किसी आलम्बन की निर्बीज समाधि) में प्रवेश करता है। इसी अवस्था में योग का अंतिम लक्ष्य प्राप्त होता है, जिसे महर्षि पतंजलि ने सूत्र 1.3 में कहा है - “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” - अर्थात् तब दृष्टा (आत्मा) अपने वास्तविक, शुद्ध और मुक्त स्वरूप (कैवल्य) में स्थित हो जाता है।