अष्टांगयोग के पाँचवें अंग - प्रत्याहार

मनुष्य का मन (मनस्) अपनी प्रकृति से ही बहिर्मुख (Extrovert) है। जैसे नदी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से सागर की ओर होता है, वैसे ही मन का प्रवाह इन्द्रियों के माध्यम से बाह्य विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) की ओर होता है। यही बहिर्मुखता संसार का कारण है और यही दुःख का मूल भी। योगसाधना का परम लक्ष्य इस प्रवाह को उलट देना—निवृत्ति या अन्तर्मुखता (Introversion) लाना—है। पतंजलि महाराज ने अष्टांगयोग के पाँचवें अंग प्रत्याहार को इसी निर्णायक मोड़ के रूप में प्रतिष्ठित किया है, जहाँ बहिरंग साधन (यम, नियम, आसन, प्राणायाम) अपना कार्य पूर्ण करके अन्तरंग साधन (धारणा, ध्यान, समाधि) के लिए भूमि तैयार करते हैं। यह लेख प्रत्याहार के दार्शनिक आधार, सूत्रगत परिभाषा, गीता के दृष्टान्त, इन्द्रियानुशासन की सूक्ष्म प्रक्रिया तथा प्राणायाम की पूर्वापेक्षा का गहन विवेचन प्रस्तुत करता है।
१. मन की स्वाभाविक बहिर्मुखता और साधना में अन्तर्मुखता की अनिवार्यता
कठोपनिषद् का प्रसिद्ध मन्त्र इस सनातन सत्य को उद्घोषित करता है:
“पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराञ्चि पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानम् आवीक्षत् आवृत्तचक्षुः अमृतत्वम् इच्छन्॥”
— कठोपनिषद् २.१.१
व्याख्या: स्वयंभू परमात्मा ने इन्द्रियों के छिद्रों को बहिर्मुख (बाहर की ओर खुलने वाला) बना दिया है। इसीलिए जीव स्वाभाविक रूप से बाह्य विषयों को ही देखता है, अन्तरात्मा को नहीं। कोई विरला धीर (वीर/ज्ञानी) पुरुष ही अमरत्व की इच्छा से नेत्रों को बन्द करके (इन्द्रियों को विषयों से खींचकर) अन्तरात्मा का साक्षात्कार करता है।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बहिर्मुखता सहज है, परन्तु अन्तर्मुखता साधनासाध्य है। बिना इन्द्रियों को उनके विषयों से विमुख किये चित्त की एकाग्रता (धारणा) असम्भव है। जैसे खुले द्वार वाले घर में वायु का वेग दीपक की लौ को स्थिर नहीं रहने देता, वैसे ही खुली इन्द्रियों वाले चित्त में प्रज्ञा (स्थिर बुद्धि) की ज्योति नहीं टिकती। अतः साधना का पहला महान संघर्ष इस प्रवृत्ति (बाहर जाने की वृत्ति) को निवृत्ति (अन्दर लौटने की वृत्ति) में बदलना है।
२. पतंजलि योगसूत्र में प्रत्याहार: स्वरूप और परिभाषा
पतंजलि ने योगसूत्र २.५४ में प्रत्याहार की सटीक तकनीकी परिभाषा दी है:
“स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इव इन्द्रियाणां प्रत्याहारः॥”
— पातञ्जलयोगसूत्र २.५४
पदव्याख्या:
- स्वविषय = इन्द्रियों के अपने-अपने विषय (शब्दादि)।
- असम्प्रयोग = संसर्ग/सम्पर्क का अभाव।
- चित्तस्य स्वरूपानुकार इव = मानो चित्त के स्वरूप (चैतन्य/साक्षीभाव) का अनुकरण करना।
- इन्द्रियाणां = इन्द्रियों का।
तात्पर्य: जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से बलपूर्वक हटकर (असम्प्रयोग), चित्त के स्वरूप (शुद्ध चैतन्य/साक्षीभाव) का अनुकरण करने लगती हैं, अर्थात् चित्त जहाँ जाता है (अन्तर्मुखी होता है), इन्द्रियाँ भी वहीं अनुगमन करती हैं—इस अवस्था का नाम प्रत्याहार है।
इसके फलस्वरूप अगले सूत्र (२.५५) में कहा गया है:
“ततः परमावश्यता इन्द्रियाणाम्॥”
— पातञ्जलयोगसूत्र २.५५ अर्थ: तत्पश्चात् इन्द्रियों की परम वशता (पूर्ण नियन्त्रण) प्राप्त होती है।
यहाँ ध्यान देने योग्य है कि प्रत्याहार दमन (Suppression) नहीं, अपितु अनुकरण (Imitation/Following) है। इन्द्रियाँ जड़ हैं, चेतन चित्त के पीछे-पीछे चलती हैं। जब साधक चित्त को विषयों से खींचकर आत्मा/साक्षी में स्थिर करता है, तब इन्द्रियाँ स्वतः ही विषयों से विमुख होकर चित्त का अनुसरण करती हैं।
३. श्रीमद्भगवद्गीता: कूर्मोपमा और स्थितप्रज्ञ का लक्षण
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता २.५८ में प्रत्याहार की सर्वश्रेष्ठ उपमा—कूर्म (कछुआ)—दी है:
“यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता २.५८
व्याख्या: जैसे कछुआ अपने सभी अंगों (सिर, पैर, पूँछ) को कवच के भीतर समेट लेता है, वैसे ही जब साधक समस्त इन्द्रियों को इन्द्रियार्थों से सर्वथा समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिष्ठित (स्थिर) हो जाती है।
गीता के छठे अध्याय (६.२५-२६) में इस प्रक्रिया का प्रक्रियात्मक वर्णन है:
“शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥ यतो यतो निश्र्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता ६.२५-२६
यहाँ ‘नियम्य’ (नियमन करना/खींचना) शब्द प्रत्याहार की क्रियात्मकता को दर्शाता है। मन चञ्चल है, बार-बार विषयों की ओर भागेगा; साधक को धैर्यपूर्वक (शनैः शनैः), बुद्धि द्वारा धारण की गई धृति (धारणा शक्ति) से, बार-बार उसे खींचकर आत्मा में स्थापित करना है। यही प्रत्याहार का अभ्यास (Practice) है।
४. पञ्च ज्ञानेन्द्रियों पर प्रत्याहार का सूक्ष्म प्रयोग: विषयानुसार निरोध
प्रत्याहार कोई अमूर्त अवस्था मात्र नहीं, यह प्रत्येक इन्द्रिय के साथ उसके विशिष्ट विषय के सम्बन्ध-विच्छेद की सूक्ष्म कला है। साधक को पाँचों ज्ञानेन्द्रियों पर पृथक्-पृथक् कार्य करना पड़ता है:
१. चक्षुः (नेत्र) — विषय: रूप (रंग/आकार)
नेत्र सबसे प्रबल और चञ्चल इन्द्रिय हैं। त्राटक इसका प्रधान साधन है। पहले बहिर्मुखी त्राटक (बिन्दु, ज्योति, मूर्ति पर एकटक देखना) से नेत्रों की गति रोकते हैं, फिर अन्तर्मुखी त्राटक (भ्रूमध्य/नासाग्र/हृदयकमल में ध्यान) द्वारा नेत्रों की ज्योति को अन्तर्मुख करते हैं। रूप के प्रति वैराग्य भावना (रूपं रोगमयं कान्ते…) रूपासक्ति को काटती है।
२. घ्राण (नासिका) — विषय: गन्ध
प्राणायाम (विशेषतः नाड़ीशोधन, भ्रामरी) घ्राणेन्द्रिय को वश में करने का मुख्य उपाय है। श्वास-प्रश्वास के साथ गन्ध का सम्बन्ध टूटता है। गन्ध के प्रति उदासीनता (न सुगन्धि में राग, न दुर्गन्धि में द्वेष) साधक को सूक्ष्म वायु तत्त्व से जोड़ती है।
३. रसना (जिह्वा) — विषय: रस (स्वाद)
मिताहार और जिह्वा-नियन्त्रण (तालु से जिह्वा लगाना—खेचरी मुद्रा की पूर्वभूमि) इसके साधन हैं। स्वाद के प्रति अनासक्ति (स्वादु-अस्वादु में समत्व) रसना को विषयों से मुक्त करती है। जिह्वा का मौन (मौन व्रत) वाक्-इन्द्रिय (कर्मेन्द्रिय) के साथ रसना को भी शान्त करता है।
४. त्वक् (त्वचा) — विषय: स्पर्श
आसनस्थैर्य (कायस्थैर्यम्) त्वचा का प्रत्याहार है। शीत-उष्ण, सुख-दुःख (स्पर्शजन्य द्वन्द्व) में समभाव रखना। शवासन/योगनिद्रा में शरीर के प्रत्येक भाग से चेतना हटाकर (न्यूनतम स्पर्श बोध) त्वचा को अन्तर्मुख करना।
५. उपस्थ/मेद्र (जननेन्द्रिय) — विषय: मैथुन/वीर्य
यह सबसे सूक्ष्म और शक्तिशाली वेगवान्तर इन्द्रिय है। ब्रह्मचर्य (वीर्य संरक्षण/ऊर्ध्वरेतस्) इसका प्रत्याहार है। मूलबन्ध, उड्डियान बन्ध, महाबन्ध तथा ओजस् की ऊर्ध्वगति द्वारा कामेन्द्रिय की ऊर्जा को कुण्डलिनी/मस्तिष्क की ओर मोड़ना। यह केवल दमन नहीं, उर्ध्वगमन (Sublimation) है।
सारांश: प्रत्येक इन्द्रिय के लिए उसका विषय-वैराग्य, बन्ध/मुद्रा, तथा प्रतिपक्ष भावना—ये तीन उपकरण प्रत्याहार को सफल बनाते हैं।
५. प्राणायाम: प्रत्याहार का अनिवार्य पूर्वाङ्ग और सहायक
पतंजलि ने अष्टांगयोग में प्राणायाम को प्रत्याहार से ठीक पहले (चतुर्थ अंग) रखा है। यह क्रम यथार्थपरक है।
“ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्। धारणासु च योग्यता मनसः॥”
— पातञ्जलयोगसूत्र २.५२-५३
व्याख्या: प्राणायाम से प्रकाशावरण (तमस् और रजस् का आवरण जो चित्त की प्रकाशशक्ति को ढके है) क्षीण होता है और मन धारणा (एकाग्रता) के योग्य बनता है।
प्राण और इन्द्रियों का अन्तर्सम्बन्ध: इन्द्रियाँ प्राण शक्ति से ही संचालित होती हैं। प्राण ही इन्द्रियों को विषयों की ओर खींचने वाला ‘घोड़ा’ है और मन ‘सारथी’।
- प्राणायाम प्राण की गति को सूक्ष्म, दीर्घ, सूक्ष्मतर (सूक्ष्मतम) बनाता है।
- जब प्राण नि:श्वास-श्वास की बाह्य गति से मुक्त होकर केवल कुम्भक (अन्तः/बाह्य) में स्थिर होता है, तब इन्द्रियों की विषयाकर्षण शक्ति स्वतः क्षीण हो जाती है।
- नाड़ीशोधन नाड़ियों को शुद्ध कर सुषुम्ना में प्राण का संचार करता है, जिससे इन्द्रियाँ स्वतः अन्तर्मुख (प्रत्याहार) होने लगती हैं।
अतः बिना प्राणायाम के प्रत्याहार का प्रयास ‘बिना घोड़े को रोके रथ रोकने’ जैसा असफल और क्लेशकारक होता है। प्राणायाम शरीर-स्तर पर कार्य कर मन-स्तर पर प्रत्याहार की भूमि तैयार करता है।
६. व्यावहारिक दृष्टान्त: दैनिक जीवन में प्रत्याहार का अनुप्रयोग
मान लीजिए एक साधक ध्यान हेतु बैठा है।
- बाह्य शोर (शब्द) आता है। सामान्य मन प्रतिक्रिया करता है: “कौन बोल रहा? क्या बोल रहा?” — यह बहिर्मुखता है।
- प्रत्याहार साधक: शोर को केवल ‘ध्वनि तरंग’ (वायु विक्षोभ मात्र) जानता है। वह श्रोत्रेन्द्रिय को आज्ञा देता है: “तुम केवल सुनने का उपकरण हो, व्याख्या (अर्थारोपण) मेरा कार्य नहीं है।” वह चित्त को ‘श्रोता’ (साक्षी) में स्थिर कर देता है। श्रोत्रेन्द्रिय विषय (शब्द) से असम्पृक्त होकर चित्त का अनुगमन करती है।
- शरीर में खुजली/दर्द (स्पर्श): साधक त्वक् इन्द्रिय से कहता है: “यह स्पर्श मात्र है, मैं द्रष्टा (साक्षी) हूँ।” वह वेदना को ‘दृश्य’ मानता है, ‘अनुभोक्ता’ नहीं बनता।
- मुँह में लार/स्वाद (रस): जिह्वा को तालु से लगाकर (खेचरी मुद्रा पूर्वाभ्यास) रसना को निष्क्रिय करता है।
- विचारों का प्रवाह (मानसिक इन्द्रिय): मन रूप/गन्ध/स्मृति के चित्र बनाता है। साधक बुद्धि (प्रज्ञा) द्वारा मन को खींचकर ‘ॐ’ या आत्म-तत्त्व में स्थापित करता है (गीता ६.२६)।
यही क्षण-प्रतिक्षण चलने वाला ‘खींचना-लगाना’ (Withdrawing and Fixing) ही प्रत्याहार की साधना है। प्रारम्भ में यह संघर्ष (Struggle) है, आगे चलकर स्वभाव (Nature) बन जाता है—यही ‘परमावश्यता इन्द्रियाणाम्’ (सूत्र २.५५) है।
७. निष्कर्ष: प्रत्याहार—बहिरंग से अन्तरंग का सेतु
प्रत्याहार मात्र इन्द्रियों का दमन नहीं, अपितु चेतना का पुनःअभिमुखीकरण (Reorientation of Consciousness) है। यह ‘बाह्य जगत्’ से ‘आन्तरिक जगत्’ की यात्रा का मुख्य द्वार है।
- दर्शनिक दृष्टि से: यह पुरुष (चेतन) और प्रकृति (इन्द्रिय/विषय) के मिथ्या तादात्म्य को तोड़कर विवेकख्याति की ओर पहला व्यावहारिक कदम है।
- मनोवैज्ञानिक दृष्टि से: यह संवेदी आदानों (Sensory Inputs) के प्रति ‘उत्तरदायित्व रहित साक्षीभाव’ (Non-reactive Awareness) विकसित करना है, जो आधुनिक मनोविज्ञान के ‘Mindfulness’ से कहीं गहरा और रूपान्तरकारी है।
- साधनात्मक दृष्टि से: बिना प्रत्याहार के धारणा (Concentration) असम्भव है, क्योंकि विक्षिप्त इन्द्रियाँ चित्त को एकाग्र नहीं रहने देंगी।
अतः साधक के लिए परमावश्यक है कि वह प्राणायाम द्वारा प्राण को सूक्ष्म करे, गीता के कूर्मवत् इन्द्रियों को विषयों से समेटे, पतंजलि के सूत्रानुसार चित्त के स्वरूप का अनुकरण कराए, तथा पञ्चेन्द्रियों के विशिष्ट विषयों के प्रति वैराग्यपूर्वक प्रत्याहार को सिद्ध करे। यही वह ‘महान संयम’ (Great Restraint) है जो बद्ध जीव को ‘योगी’ (मुक्त पुरुष) में रूपान्तरित करता है।
“इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता २.६७ (जैसे जल में वायु नौका को हर ले जाता है, वैसे ही इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन ज्ञानवान पुरुष की प्रज्ञा को हर लेता है।)
प्रत्याहार ही वह नौका का लंगर (Anchor) है जो मन को विषय-वायु में बहने से रोकता है।


