Avalokiteshwara Stotra


Avalokiteshwara Stotra

Arya Avalokiteshwara

यहाँ श्री वासुकि नागराज द्वारा रचित “आर्यावलोकितेश्वर स्तोत्र” का संस्कृत से हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। शब्दार्थ को ध्यान में रखते हुए भावानुवाद किया गया है ताकि सरलता और आध्यात्मिक रस दोनों बने रहें।

॥ हिंदी अनुवाद ॥

ॐ नमोऽवलोकितेश्वराय । (ॐ, अवलोकितेश्वर को नमस्कार है।)

श्लोक १:

जटाधरं सौम्यविशाललोचनं सदाप्रसन्नाननचन्द्रमण्डलम् । सुरासुरैर्वन्दितपादपङ्कजं नमामि नाथं मणिपद्मसम्भवम् ॥

अनुवाद: जो जटा धारण करने वाले हैं, जिनके नेत्र सौम्य एवं विशाल हैं, जिनका मुख-चन्द्रमण्डल सदा प्रसन्न रहता है, देवों और दानवों द्वारा जिनके चरण-कमलों की वन्दना की जाती है, उन मणिपद्म (कमल से) प्रकट हुए नाथ (अवलोकितेश्वर) को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक २:

सरोजपत्रायतदिव्यलोचनं कुदृष्टिसंशोधितशुद्धलोचनम् । कृपामृतार्द्रं जगदेकलोचनं नमामि नाथं मणिपद्मसम्भवम् ॥

अनुवाद: कमल की पंखुड़ी के समान विस्तृत दिव्य नेत्रों वाले, कुटिल दृष्टि का शोधन कर शुद्ध दृष्टि प्रदान करने वाले, कृपा रूपी अमृत से आर्द्र (भीगे हुए), सम्पूर्ण जगत के एकमात्र नेत्र (आँख) के समान पूज्य, उन मणिपद्म से प्रकट नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक ३:

हारेन्दुहारार्धहिमाधिकोज्जवलं निघृष्टगण्डामललोलकुण्डलम् । गभस्तिमालाकुलकोटिसङ्कुलं नमामि नाथं मणिपद्मसम्भवम् ॥

अनुवाद: मोतियों के हार, चन्द्रमा, अर्धहार और हिम (बर्फ) से भी अधिक उज्ज्वल कान्ति वाले, जिनके गालों पर स्वच्छ एवं लोल (झूलते हुए) कुण्डल शोभायमान हैं, तथा किरणों की माला से व्याप्त असंख्य प्रभाओं से युक्त, उन मणिपद्म से प्रकट नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक ४:

प्रबुद्धधर्माध्वनि धर्मधातुकं सहस्रबाहुं द्विचतुश्च षड्भुजम् । खधातुना तुल्यमनन्तबाहुकं नमामि नाथं मणिपद्मसम्भवम् ॥

अनुवाद: जो प्रबुद्ध (जागृत) धर्म के मार्ग में स्थित हैं, धर्मधातु (समस्त धर्मों के मूल) स्वरूप हैं, जिनकी सहस्र भुजाएँ हैं तथा (लीला में) दो, चार और छह भुजाओं वाले रूप भी धारण करते हैं, आकाश के समान (असीम) जिनकी अनन्त भुजाएँ हैं, उन मणिपद्म से प्रकट नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक ५:

उपायप्रज्ञोदधिमन्थनोद्भवं त्रिधातुसंरक्षणहेतुसम्भवम् । जिनेन्द्रमौलिं जिनधातुसम्भवं नमामि नाथं मणिपद्मसम्भवम् ॥

अनुवाद: उपाय (करुणा) और प्रज्ञा (ज्ञान) रूपी समुद्र के मंथन से उत्पन्न, तीनों धातुओं (त्रैलोक्य) की रक्षा के कारणभूत, जिनेन्द्र (बुद्ध) के मुकुट में विराजमान तथा जिनधातु (बुद्ध स्वरूप) से प्रकट, उन मणिपद्म से उत्पन्न नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक ६:

पद्मोपरि गतं नाथं पद्महस्तं जटाधरम् । आर्यावलोकितं वन्दे सर्वसत्त्वानुकम्पकम् ॥

अनुवाद: कमल के ऊपर विराजमान, हाथ में कमल धारण करने वाले, जटाधारी, सम्पूर्ण प्राणियों पर अनुकम्पा (दया) करने वाले, उन आर्य अवलोकितेश्वर की मैं वन्दना करता हूँ।

इति श्री वासुकिनागराजकृत आर्यावलोकितेश्वर स्तोत्र सम्पूर्णम् । (यह श्री वासुकि नागराज द्वारा रचित आर्यावलोकितेश्वर स्तोत्र पूर्ण हुआ।)